रोमियों 12:1-5 (Romans 12: 1-5)

 रोमियों 12:1-5

"1 इसलिए भाइयो, मैं तुम्हें परमेश्वर की करुणा का वास्ता देकर तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि तुम अपने शरीर को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भानेवाले बलिदान के तौर पर अर्पित करो। इस तरह तुम अपनी सोचने-समझने की शक्‍ति का इस्तेमाल करते हुए पवित्र सेवा कर सकोगे।
और इस दुनिया की व्यवस्था के मुताबिक खुद को ढालना बंद करो, मगर अपने मन को नयी दिशा देने की वजह से तुम्हारी कायापलट होती जाए, ताकि तुम परखकर खुद के लिए मालूम करते रहो कि परमेश्वर की भली, उसे भानेवाली और उसकी सिद्ध  इच्छा क्या है।
मुझ पर जो महा-कृपा हुई है, उसके ज़रिए मैं तुममें से हरेक से, जो वहाँ हैं, यह कहता हूँ कि कोई भी अपने आपको जितना समझना चाहिए, उससे बढ़कर न समझे, बल्कि परमेश्वर ने हरेक को जो विश्वास बाँटा है उसी के मुताबिक समझे, ताकि वह स्वस्थ मन हासिल करे। 
इसलिए कि जैसे हमारे एक ही शरीर में अनेक अंग हैं और सभी अंगों का काम एक जैसा नहीं है, 
वैसे ही हम भी अनेक होते हुए भी मसीह के साथ एकता में एक शरीर हैं और एक-दूसरे से जुड़े अंग हैं। "

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परमेश्वर इस वचन के अनुसार हमें कहते हैं कि हम अपने मन को स्थिर करें। सांसारिक गतिविधियों के अनुसार अपने आप को ढालना बंद करें। मन को जाँचें परखें और नयी दिशा दें। नयी सोच समझ के साथ परमेश्वर कि योजना मे सहभागी बनें। 

कोई अपने आप को बढ़ कर ना समझें और न ही अधिक बुद्धिमान समझे, वरन परमेश्वर के वचनो के अनुसार चलनेवाले और आज्ञा मानने वाले बनें।

जिस प्रकार हमारे शरीर के हर अंग एक जैसे काम नही करते, वैसे ही हर एक मनुष्य के मन और विचार अलग हैं, पर हमें विभिन्नता में भी एक साथ परमेश्वर पर बनें रहना है, जैसे हमारे शरीर के विभिन्न अंग एक-दूसरे से जुड़े हुवे हैं।

 परमेश्वर इस छोटी शिक्षा पर बहुतायत से आशीष दे 

॥ आमीन ॥
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