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Saturday, January 31, 2015

यिर्मयाह 9:23-24

यिर्मयाह 9:23-24
(Jeremiah 9: 23-24)
"यहोवा यों कहता है, बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे, न वीर अपनी वीरता पर, न धनी अपने धन पर घमण्ड करे; परंतु जो घमण्ड करे वह इसी बात पर घमण्ड करे, कि वह मुझे जानता और समझता है, कि मैं ही वह यहोवा हूँ, जो पृथ्वी पर करूणा, न्याय और धर्म के काम करता है; क्योंकि मैं इन्हीं बातों से प्रसन्न रहता हूँ॥"

***

सांसारिक जीवन में हम देखने पाते हैं कि हर व्यक्ति अपनी खुद की आवश्यकताओं को पुरा करने में लगा हुआ है। हर कोई पारिवारिक और सांसारिक गतिविधियों में अपना समय व्यतीत कर रहा है। हर व्यक्ति एक दुसरे से प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है, और अपने आप को प्रथम स्थान में देखना चाहता है। जिसके फलस्वरूप लोगों में घमण्ड की भावना उत्पन्न हो गयी है।

विश्वास की जगह, घमण्ड में लोग अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कोई अपने धन पे, कोई अपने बुद्धिमान होने पर, तो कोई अपने वीर होने पर। ऐसा व्यतीत होता है मानों जैसे घमण्ड की लंबी कतार सी बन गयी हो।
इन्हीं बातों और कामों पर हर कोई अपने आपको प्रसन्न समझता है। पर मनुष्य ये भूल गया कि पर्मेश्वर पिता इन सभी बातों से कभी भी खुश नहीं हो सकते।

पर्मेश्वर का वचन कहता है कि हम सब पर्मेश्वर और उनके वचनों को सीखने और समझने पर घमण्ड करें, और जानें कि वही हमारा यहोवा है, जो इस पृथ्वी पर अदभुत रीति से कार्य करता है। वही करूणा, वही न्याय और वही धर्म के कामों को पूर्ण करता है।

वही हमारा ढाल भी है, जो समय समय पर हमें बचाता भी है।
पर्मेश्वर अच्छे कामों से, अच्छे संगति से ही प्रसन्न होता है, न कि द्वेष से और न ही घमण्ड से।

पर्मेश्वर इस छोटी शिक्षा पर आशीष दे॥ आमीन ॥

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द्वारा 
(नवीन मिंज)
Published: By: Naveen Minj - 7:08:00 PM

Sunday, January 11, 2015

रोमियों 12:1-5

 रोमियों 12:1-5
(Romans 12: 1-5)
"1 इसलिए भाइयो, मैं तुम्हें परमेश्वर की करुणा का वास्ता देकर तुमसे गुज़ारिश करता हूँ कि तुम अपने शरीर को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भानेवाले बलिदान के तौर पर अर्पित करो। इस तरह तुम अपनी सोचने-समझने की शक्‍ति का इस्तेमाल करते हुए पवित्र सेवा कर सकोगे।
और इस दुनिया की व्यवस्था के मुताबिक खुद को ढालना बंद करो, मगर अपने मन को नयी दिशा देने की वजह से तुम्हारी कायापलट होती जाए, ताकि तुम परखकर खुद के लिए मालूम करते रहो कि परमेश्वर की भली, उसे भानेवाली और उसकी सिद्ध  इच्छा क्या है।
मुझ पर जो महा-कृपा हुई है, उसके ज़रिए मैं तुममें से हरेक से, जो वहाँ हैं, यह कहता हूँ कि कोई भी अपने आपको जितना समझना चाहिए, उससे बढ़कर न समझे, बल्कि परमेश्वर ने हरेक को जो विश्वास बाँटा है उसी के मुताबिक समझे, ताकि वह स्वस्थ मन हासिल करे। 
इसलिए कि जैसे हमारे एक ही शरीर में अनेक अंग हैं और सभी अंगों का काम एक जैसा नहीं है, 
वैसे ही हम भी अनेक होते हुए भी मसीह के साथ एकता में एक शरीर हैं और एक-दूसरे से जुड़े अंग हैं। "

***

परमेश्वर इस वचन के अनुसार हमें कहते हैं कि हम अपने मन को स्थिर करें। सांसारिक गतिविधियों के अनुसार अपने आप को ढालना बंद करें। मन को जाँचें परखें और नयी दिशा दें। नयी सोच समझ के साथ परमेश्वर कि योजना मे सहभागी बनें। 

कोई अपने आप को बढ़ कर ना समझें और न ही अधिक बुद्धिमान समझे, वरन परमेश्वर के वचनो के अनुसार चलनेवाले और आज्ञा मानने वाले बनें।

जिस प्रकार हमारे शरीर के हर अंग एक जैसे काम नही करते, वैसे ही हर एक मनुष्य के मन और विचार अलग हैं, पर हमें विभिन्नता में भी एक साथ परमेश्वर पर बनें रहना है, जैसे हमारे शरीर के विभिन्न अंग एक-दूसरे से जुड़े हुवे हैं।

 परमेश्वर इस छोटी शिक्षा पर बहुतायत से आशीष दे 

॥ आमीन ॥
Published: By: Naveen Minj - 9:05:00 AM

 

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